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Showing posts from March, 2018

बचपन की रेत...!

तुझे याद है भाई, नानी के घर क पीछे जो बाग़ था,
हम अमियां चुराया करते थे;
कुंए में पथ्थर फेकते,
उसमे नाम चिल्लाया करते थे|

कितने सारे सबक तो हमने,
अमरुद की डाली पर लटककर सीखे थे;
और छोटे छोटे करोंदे खट्टे होते हैं,
कहीं पढ़ा नहीं पर
जाना जब हमने खुद चीखे थे|

पपीते से थोड़ी कम बनती थी,
कभी हाँथ ही नहीं आया,
शायद उसे हमसे थोड़ा काम प्यार था;
केला तो दोस्त था अपना,
हमेशा पेट भरने को तय्यार था|

अरे मैं वो झूला कैसे भूल गई
जो पापा के स्कूटर क टायर से बनाया था,
कहीं जगह ही ना समझी,
इसलिए बाग़ क दरवाजे पर लटकाया था|

पर भाई अब ना वो झूला है ना ही पेड़ हैं,
कहते हैं मल्टी स्टोरी है , हमारे लिए तो मिटटी का ढेर हैं;
बारिश की सोंधी खुशबू, आम क पेड़ की छाओं की जगह कोई ले पायेगा,
और ऐ सी का १६ डिग्री मन को वो ठंडक दे पायेगा?

पर सिर्फ वो बाग़ नहीं भाई जो खो गया है,
मेरे बचपन का साथी मेरा दोस्त भी मुझसे दूर हो गया है;
मैं ढूंढ़ती हूँ आज भी तुम्हे आइस क्रीम खाने को,
चाट की दूकान पर जाने को;

मैगी के लिए मुझसे अब कोई नहीं लड़ता,
कितना भी छुपा लूँ, डायरी ढूंढ ढूंढ़कर कोई नहीं पड़ता;
मेरा मन शायद अभी भी उसी बाग़ मेँ…

The SELF apprehension...!!!

It happened 2 days ago! This guy, my mother's son-in-law; opened my shelf and laughed straight for 10 minutes.
I wondered what was so funny in there? Was that my overly arranged clothes or properly settled jewelry boxes? After pondering for a while and avoiding my yearn to kick him hard between butts, I approached him and saw him reading my 'to do list'. All my anger was then my embarrassment. He started reading my list out loud and crossed almost everything out of it. 'You don't do any of this! Hahahahah...'

He was right. I'm not the girl I used to be. I knew he didn't mean to embarrass me or hurt my feelings but he sure dust away the dirt from my mirror. I used to be so ambitious, active and thrilled about my list. Even when I listed why should I get married, top on that was, 'Once I'll be done with it, I'll focus on my goals, otherwise my parents will keep haunting me every other day.' Look at me now, I don't write, I don't lis…